जीवितपुत्रिका व्रत (जितिया व्रत या जितिया के नाम से भी जाना जाता है) माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु और कल्याण के लिए रखा जाने वाला कठोर व्रत है, जो भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी (अमांत) को पड़ता है। पूर्णिमांत पद्धति में इसी दिन को आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी कहा जाता है।
यह व्रत जीमूतवाहन की कथा से जुड़ा है, जिन्होंने गरुड़ द्वारा निगले जाने वाले एक युवा नाग के बदले अपना शरीर अर्पित किया और यह वरदान पाया कि किसी नाग को फिर कभी हानि न पहुंचे। माताएं उनकी स्मृति में यह व्रत रखती हैं, अपनी संतान की रक्षा और दीर्घायु के लिए प्रार्थना करती हैं। यह व्रत परंपरागत रूप से तीन दिनों का होता है: नहाय-खाय, अष्टमी को निर्जला व्रत, और अगले दिन पारण।
परंपरा और विधि
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जीमूतवाहन
गरुड़ से एक युवा नाग को बचाने के लिए स्वयं को अर्पित करने वाले गंधर्व राजकुमार, जिनकी स्मृति में यह व्रत रखा जाता है।
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तीन दिनों का व्रत
परंपरागत रूप से नहाय-खाय, अष्टमी को निर्जला व्रत, और अगले दिन पारण के साथ मनाया जाता है।